This also must have been included into Mahabharata from those puranas. The number of verses in each Purana is listed in other verses of the Srimad-Bhagavatam (12.13.4-9): The Brahma Purana consists of ten thousand verses, the Padma Purana of fifty-five thousand, Sri Visnu Purana of twenty-three thousand, the Siva Purana of twenty-four thousand and Srimad-Bhagavatam of eighteen thousand. El Padma-purana es uno de los 18 majá-purana (‘grandes Puranas’, libros sagrados para los hinduistas). Guru Stotra. Vidy Sa. Padma Purana (Original Sanskrit Text) about the importance of Rudraksha to the sages, Vyas said--- One who wears a Rudraksha rosary is supreme among all human beings. In order to establish the superiority of viShNu over Siva, the site is they establish viShNu as Supreme Brahman and viShNu is a person with attributes i.e. It is said that there are eighteen Mahapuranas comprising more than four lakhs of slokas. The mere sight of such a holy man absolves people of their sin. The Padma Purana (Sanskrit: पद्म पुराण) is one of the eighteen Maha Puranas, a genre of texts of Hinduism in sanskrit. Data aproximadamente de los siglos VIII y IX de nuestra era. यत्पद्मं सा रसादेवी प ष्थ्वी परिचक्ष्यते।। (पदम पुराण), अर्थात् भगवान विष्णु की नाभि से जब कमल उत्पन्न हुआ तब वह पृथ्वी की तरह था। उस कमल (पद्म) को ही रसा या पष्थ्वी देवी कहा जाता है। इस पष्त्वी में अभिव्याप्त आग्नेय प्राण ही ब्रह्मा हैं जो चर्तुमुख के रूप में अर्थात् चारों ओर फैला हुआ सष्ष्टि की रचना करते हैं और वह कमल जिनकी नाभि से निकला है, वे विष्णु भगवान सूर्य के समान पष्थ्वी का पालन-पोषण करते हैं।, पदमपुराण में नन्दी धेनु उपाख्यान, वामन अवतार की कथा, तुलाधार की कथा, सुशंख द्वारा यम कन्या सुनीथा को श्राप की कथा, सीता-शुक संवाद, सुकर्मा की पितष् भक्ति तथा विष्णु भगवान के पुराणमय स्वरूप का अद्भुत वर्णन है। पद्मपुराण के अनुसार व्यक्ति ज्यादा कर्मकाण्डों पर न जाकर यदि साधारण जीवन व्यतीत करते हुये, सदाचार और परोपकार के मार्ग पर चलता है तो उसे भी पुराणों का पूर्ण फल प्राप्त होता है तथा वह दीर्घ जीवी हो जाता है। पद्मपुराण में पचपन हजार श्लोक हैं जो पाँच खण्डों में विभक्त हैं। जिसमें पहला खण्ड सृष्टिखण्ड, दूसरा-भूमिखण्ड, तीसरा-स्वर्गखण्ड, चैथा-पातालखण्ड, पाँचवा-उत्तरखण्ड।, ‘पदमपुराण’ को पांच खण्डों में विभाजित किया गया है। ये खण्ड इस प्रकार हैं-, उपयुक्त खण्डों के अतिरिक्त ‘ब्रह्म खण्ड’ और ‘क्रियायोग सागर खण्ड’ का वर्णन भी मिलता है, परन्तु ‘नारद पुराण’ में जो खण्ड सूची है, उसमें पांच ही खण्ड दिए गए हैं। उसमें ब्रह्म खण्ड और क्रियायोग सागर खण्ड का उल्लेख नहीं है। प्राय: पांच खण्डों का विवेचन ही पुराण सम्बन्धी धार्मिक पुस्तकों में प्राप्त होता है। इसलिए यहाँ पांच खण्डों पर ही प्रकाश डाला जा रहा है।, सृष्टि खण्ड में बयासी अध्याय हैं। यह पांच उपखण्डों- पौष्कर खण्ड, तीर्थ खण्ड, तृतीय पर्व खण्ड, वंशानुकीर्तन खण्ड तथा मोक्ष खण्ड में विभाजित है। इसमें मनुष्यों की सात प्रकार की सृष्टि रचना का विवरण है। साथ ही सावित्री सत्यवान उपाख्यान, पुष्कर आदि तीर्थों का वर्णन और प्रभंजन, धर्ममूर्ति, नरकासुर, कार्तिकेय आदि की कथाएं हैं। इसमें पितरों का श्राद्धकर्म, पर्वतों, द्वीपों, सप्त सागरों आदि का वर्णन भी प्राप्त होता है।, आदित्य शयन और रोहिण चन्द्र शयन व्रत को अत्यन्त पुण्यशाली, मंगलकारी और सुख-सौभाग्य का सूचक बताया गया है। तीर्थ माहात्म्य के प्रसंग में यह खण्ड इस बात की सूचना देता है कि किसी भी शुक्ल पक्ष में मंगलवार के दिन या चतुर्थी तिथि को जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्राद्धकर्म करता है, वह कभी प्रेत योनि में नहीं पड़ता। श्रीरामचन्द्र जी ने अपने पिता का श्राद्ध पुष्कर तीर्थ में जाकर किया था, इसका वर्णन भी प्राप्त होता है। रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग की पूजा का उल्लेख भी इसमें मिलता है। कार्तिकेय द्वारा तारकासुर के वध की कथा भी इसमें प्राप्त होती है।, इस खण्ड में बताया गया है कि एकादशी के प्रतिदिन आंवले के जल से स्नान करने पर ऐश्वर्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। आवंले की महिमा का बखान करने के उपरान्त तुलसी की महिमा का भी वर्णन है। तुलसी का पौधा घर में रहने से भूत-प्रेत, रोग आदि कभी प्रवेश नहीं करते। इसमें व्यास जी गंगाजल के एक मूलमन्त्र का भी वर्णन करते हैं। उनके मतानुसार जो व्यक्ति निम्रवत् मन्त्र का एक बार जप करके गंगाजल से स्नान करता है, वह भगवान विष्णु के चरणों का संयोग प्राप्त कर लेता है।, मन्त्र इस प्रकार है, जो सृष्टि खण्ड के गंगा माहात्म्य-45 में वर्णित है-, ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम:।, अर्थात् विश्व रूप वाली साक्षात् नारायण स्वरूप भगवती गंगा के लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है। गंगा की स्तुति के बाद श्रीगणेश और सूर्य की स्तुति की गई है तथा संक्रान्ति काल के पुण्य फल का उल्लेख किया गया है।, भूमि खण्ड में अनेक आख्यान हैं। ब्रह्मचर्य, दान, मानव धर्म आदि का वर्णन इस खण्ड में है। जैन धर्म का विवेचन भी इसमें है। भूमि खण्ड के प्रारम्भ में शिव शर्मा ब्राह्मण द्वारा पितृ भक्ति और वैष्णव भक्ति की सुन्दर गाथा प्रस्तुत की गई है। इसके उपरान्त सोम शर्मा द्वारा भगवान विष्णु की भावना युक्त स्तुति है। इसके बाद इसके उपरान्त सोम शर्मा, भगवान विष्णु की भावना युक्त स्तुति है। इसके बाद वेन पुत्र राजा पृथु के जन्म एवं चरित्र, गन्धर्व कुमार सुशंख द्वारा मृत्यु अथवा यम कन्या सुनीया को शाप, अंग की तपस्या, वेन द्वारा विष्णु की उपासना और पृथु के आविर्भाव की कथा का पुन: आवर्तन, विष्णु द्वारा दान काल के भेदों का वेन को उपदेश, सुकाला की कथा, शूकर-शूकरी की उपाख्यान, पिप्पल की पितृ तीर्थ प्रसंग में तपस्या, सुकर्मा की पितृ भक्ति, भगवान शिव की महिमा और भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला स्तोत्र आदि का उल्लेख प्राप्त होता है।, ययाति की जरावस्था, कामकन्या से भेंट तथा पुत्र पुरू द्वारा यौवन दान की प्रसिद्ध कथा भी इस खण्ड में दी गई है। अन्त में गुरु तीर्थ के प्रसंग में महर्षि च्यवन की कथा, कुंजल पक्षी द्वारा अपने पुत्र उज्ज्वल को ज्ञानव्रत और स्तोत्र का उपदेश आदि का वर्णन भी इस खण्ड में मिलता हे। साथ ही ‘शरीरोत्पत्तिह’ का भी सुन्दर विवेचन इस खण्ड में किया गया है।, स्वर्ग खण्ड में बासठ अध्याय हैं। इसमें पुष्कर तीर्थ एवं नर्मदा के तट तीर्थों का बड़ा ही मनोहारी और पुण्य देने वाला वर्णन है। साथ ही शकुन्तला-दुष्यन्त उपाख्यान, ग्रह-नक्षत्र, नारायण, दिवोदास, हरिश्चन्द्र, मांधाता आदि के चरित्रों का अत्यन्त सुन्दर वर्णन यहाँ प्राप्त होता है। खण्ड के प्रारम्भ में भारतवर्ष के वर्णन में कुल सात पर्वतों, एक सौ बाईस नदियों, उत्तर भारत के एक सौ पैंतीस तथा दक्षिण भारत के इक्यावन जनपदों और मलेच्छ राजाओं का भी इसमें वर्णन है। इसी सन्दर्भ में बीस बलिष्ठ राजाओं की सूची भी दी गई है। साथ ही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का भी सुन्दर विवेचन है।, विविध तीर्थों के अन्तर्गत में नागराज तक्षक की जन्मभूमि विताता (कश्मीर), गया है कि ‘ब्रह्म पुराण‘ हरि का मस्तक और ‘पदम पुराण’ उनका हृदय है। ‘विष्णु पुराण‘ दाईं भुजा, ‘शिव पुराण‘ बाईं भुजा, ‘श्रीमद् भागवत पुराण’ दो आंखें, ‘नारद पुराण‘ नाभि, ‘मार्कण्डेय पुराण‘ दायां चरण, ‘अग्नि पुराण‘ बायां चरण, ‘भविष्य पुराण‘ दायां घुटना, ‘ब्रह्म वैवर्त पुराण‘ बायां घुटना, ‘लिंग पुराण‘ दायां टखना, ‘वराह पुराण‘ बायां टखना, ‘स्कन्द पुराण‘ शरीर के रोएं, ‘वामन पुराण‘  त्वचा, ‘कूर्म पुराण‘ पीठ, ‘मत्स्य पुराण‘  मेदा, ‘गरुड़ पुराण‘  मज्जा और ‘ब्रह्माण्ड पुराण‘ उनकी अस्थियां हैं।, इसी खण्ड में ‘एकादशी व्रत’ का माहात्म्य भी बताया गया है। कहा गया है कि जितने भी अन्य व्रतोपवास हैं, उन सब में एकादशी व्रत सबसे उत्तम है। इस उपवास से भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न होकर वरदान देते हैं।, पाताल खण्ड में रावण विजय के उपरान्त राम कथा का वर्णन है। श्रीकृष्ण की महिमा, कृष्ण तीर्थ, नारद का स्त्री रूप आख्यान्, रावण तथा अन्य राक्षसों का वर्णन, बारह महीनों के पर्व और माहात्म्य तथा भूगोल सम्बन्धी सामग्री भी इस खण्ड में उपलब्ध होती है। वस्तुत: इस खण्ड में भगवान विष्णु के ‘रामावतार’ और ‘कृष्णावतार’ की लीलाओं का ही वर्णन प्राप्त होता है।, उत्तर खण्ड में जलंधर राक्षस और सती पत्नी तुलसी वृन्दा की कथा तथा अनेक देवों एवं तीर्थों के माहात्म्स का वर्णन है। इस खण्ड का प्रारम्भ नारद-महादेव के मध्य बद्रिकाश्रम एवं नारायण की महिमा के संवाद के साथ होता है। इसके पश्चात गंगावतरण की कथा, हरिद्वार का माहात्म्य; प्रयाग, काशी एवं गया आदि तीर्थों का वर्णन है।’पद्म पुराण’ की रचना बारहवीं शताब्दी के बाद की मानी जाती है। इस पुराण में नन्दी धेनु उपाख्यान, बलि-वामन आख्यान, तुलाधार की कथा आदि द्वारा सत्य की महिमा का प्रतिपादन किया गया है। तुलाधार कथा से पतिव्रत धर्म की शक्ति का पता चलता है।, इन उपाख्यानों द्वारा पुराणकार ने यही सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि सत्य का पालन करते हुए सादा जीवन जीना सभी कर्मकाण्डों और धार्मिक अनुष्ठानों से बढ़कर है। सदाचारियों को ही ‘देवता’ और दुराचारियों तथा पाश्विक वृत्तियां धारण करने वाले को ‘राक्षस’ कहा जाता है। पूजा जाति की नहीं, गुणों की होनी चाहिए। धर्म विरोधी प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए प्रभु कीर्तन बहुत सहायक होता है।, इस खण्ड में पुरुषों के कल्याण का सुलभ उपाय धर्म आदि की विवेचन तथा निषिद्ध तत्वों का उल्लेख किया गया है। पाताल खण्ड में sri ram के प्रसंग का कथानक आया है। इससे यह पता चलता है कि भक्ति के प्रवाह में विष्णु और राम में कोई भेद नहीं है। उत्तर खण्ड में भक्ति के स्वरूप को समझाते हुए योग और भक्ति की बात की गई है। साकार की उपासना पर बल देते हुए जलंधर के कथानक को विस्तार से लिया गया है।, क्रियायोग सार खण्ड में Bhagwan Krishna के जीवन से सम्बन्धित तथा कुछ अन्य संक्षिप्त बातों को लिया गया है। इस प्रकार यह खण्ड सामान्यत: तत्व का विवेचन करता है। पदम-पुराण के विषय में कहा गया है कि यह पुराण अत्यन्त पुण्य-दायक और पापों का विनाशक है। सबसे पहले इस पुराण को ब्रह्मा ने पुलस्त्य को सुनाया और उन्होंने फिर भीष्म को और भीष्म ने अत्यन्त मनोयोग से इस पुराण को सुना, क्योंकि वे समझते थे कि वेदों का मर्म इस रूप में ही समझा जा सकता है।, पदमपुराण सुनने से जीव के सारे पाप क्षय हो जाते हैं, धर्म की वष्द्धि होती है। मनुष्य ज्ञानी होकर इस संसार में पुर्नजन्म नहीं लेता। पद्मपुराण कथा करने एवं सुनने से प्रेत तत्व भी शान्त हो जाता है। यज्ञ दान तपस्या और तीर्थों में स्नान करने से जो फल मिलता है वह फल पद्मपुराण की कथा सुनने से सहजमय ही प्राप्त हो जाता है। मोक्ष प्राप्ति के लिये पद्म पुराण सुनना सर्वोत्तम उपाय है।, पदमपुराण कथा करवाने के लिये सर्वप्रथम विद्वान ब्राह्मणों से उत्तम मुहुर्त निकलवाना चाहिये। पद्मपुराण के लिये श्रावण-भाद्रपद, आश्विन, अगहन, माघ, फाल्गुन, बैशाख और ज्येष्ठ मास विशेष शुभ हैं। लेकिन विद्वानों के अनुसार जिस दिन पद्मपुराण कथा प्रारम्भ कर दें, वही शुभ मुहुर्त है।, पदमपुराण करवाने के लिये स्थान अत्यधिक पवित्र होना चाहिये। जन्म भूमि में पद्मपुराण करवाने का विशेष महत्व बताया गया है – जननी जन्मभूमिश्चः स्वर्गादपि गरियशी – इसके अतिरिक्त हम तीर्थों में भी पद्मपुराण का आयोजन कर विशेष फल प्राप्त कर सकते हैं। फिर भी जहाँ मन को सन्तोष पहुँचे, उसी स्थान पर कथा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।, पदमपुराण का वक्ता विद्वान ब्राह्मण होना चाहिये। उसे शास्त्रों एवं वेदों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिये। पद्मपुराण में सभी ब्राह्मण सदाचारी हों और सुन्दर आचरण वाले हों। वो सन्ध्या बन्धन एवं प्रतिदिन गायत्री जाप करते हों। ब्राह्मण एवं यजमान दोनों ही सात दिनों तक उपवास रखें। केवल एक समय ही भोजन करें। भोजन शुद्ध शाकाहारी होना चाहिये। स्वास्थ्य ठीक न हो तो भोजन कर सकते हैं।.

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